कोरोना ने सुई के जादूगरों को खूब रुलाया, मुफलिसी का जीवन जीने को मजबूर


फर्रूखाबाद: लहंगों में चमक के पीछे सबसे बड़ा हाथ कारीगरों का होता है। जरदोजी के लहंगों में चार चांद लगाने वाले कारीगरों को सुई का जादूगर कहा जाता है। लेकिन कोरोना काल के चलते यह सुई के जादूगर मुफलिसी का जीवन जीने को मजबूर हो रहे हैं। अभी 35 प्रतिशत ही काम शुरू हो सका है, इसलिए आधे से अधिक जरदोजी कारीगर काम न होने से खाली हाथ बैठे हैं।

जिले में एक लाख के लगभग आबादी जरदोजी कारोबार से जुड़ी है, जिसमें एक बड़ी संख्या कारीगरों की है। कारीगर जरदोजी से अपना घर परिवार चलाते हैं। लेकिन कोरोना काल के चलते सबसे बड़ी दिक्कतें इन कारीगरों को उठानी पड़ी हैं। लगभग चार माह कारीगर दर दर भटकने को मजबूर हुए। अब जो 35 प्रतिशत काम शुरू हुआ है तो कारीगरों को काम मिलना शुरू हो गया है। लेकिन अभी भी 50 प्रतिशत कारीगर खाली हाथ बैठने को मजबूर हैं। इनको काम नहीं मिल सका है। जरदोजी का काम शुरू होने की आस में कारीगर महीनों इंतजार करते रहे। लेकिन जब काम शुरू नहीं हो सका तो आज बड़ी संख्या में जरदोजी कारीगर अन्य दूसरे कार्य करने को मजबूर हैं।

मोहम्मद शाहना व मोहम्मद रिजवान ऐसे ही कारीगर हैं जो लहंगों को बनाने का कारखाने में काम करते थे। लेकिन कई माह के इंतजार के बाद जब काम शुरू नहीं हुआ तो उन्होंने सब्जी बेचने का काम शुरू कर दिया। बताते हैं कि अभी तो उनको कारखाने से बुलावा नहीं आया है। नासिर कॅास्मेटिक के सामान की फेरी लगा रहे हैं। बताया कि अभी तक जिस कारखाने में काम करते थे वहां से बुलावा तक नहीं आया है। ऐसे यह दो कारीगर ही नहीं हैं। काम पूरी तरह से शुरू न होने से हजारों कारीगर भटक कर बस अपना और अपने परिवार का दूसरे काम करके पेट पाल रहे हैं।

जरदोजी के हजारों कारीगर कर गए पलायन
फर्रूखाबाद। जरदोजी के काम की शुरुआत होने की आस में थक चुके हजारों कारीगर दूसरे शहरों में पलायन कर गए हैं। लंबे इंतजार के बाद जब काम नहीं मिला तो ऐसे कारीगर अब दूसरे शहरों में काम की तलाश में जा चुके हैं। साहिबे आलम, सलमान, जुबैर खान, राहुल आदि कारीगर अभी पिछले हफ्ते ही दिल्ली को रोजी रोटी की तलाश में चले गए हैं। कई कारीगर ई रिक्शा चलाने लगे हैं।

कोरोना काल की जरदोजी कारोबार पर ऐसी मार पड़ी है कि अभी तक हालात सुधर नहीं पाए हैं। लगभग 35 से 40 प्रतिशत ही कारोबार शुरू हो सका है। इसलिए कारखाना मालिक कारीगरों से एक एक नफरी का ही काम करा रहे हैं। एक नफरी से कारीगरों का भला नहीं हो रहा है। कारखाना मालिकों की मानें तो उनके पास जो आर्डर आ रहे हैं वह कम हैं इसलिए सभी कारीगरों को एक एक नफरी का काम दे रहे हैं। जब काम अच्छा चलने लगेगा तो दो-दो नफरी तक का काम दिया जाने लगेगा।