अन्ना मवेशियों से खींची आत्मनिर्भरता के साथ तकदीर की नई राह


फर्रूखाबाद: हाईटेक मशीनरी के दौर के बीच जिले के एक गांव के किसानों ने छुट्टा अन्ना मवेशियों से तकदीर और आत्मनिर्भरता की एक नई राह खींची है।

शहर से सटे आमिलपुर गांव में आज लगभग प्रत्येक घर में बैल, हल और बैलगाड़ी है। किसान बैलों से खेत जोत रहे हैं और बैलगाडी से बोझा ढोने का काम कर रहे हैं। आं हां तिका तिका जी हां यह वह आवाज है जो खेतों से लेकर हर पगडंडियों तक कभी सुनाई देती थी। ग्रामीण और किसान खेतों में हल चलाते या बैलगाडी हांकते इसी जुमले को बार बार दोहराते नजर आते थे। लेकिन मशीनरी और हाईटेक जमानें के बीच यह आवाज आज कहीं न कहीं दबती चली गई। या यूं कहिए कि हल बैलगाडी कभी ग्रामीण इलाकों की शान होती थी वह धीरे धीरे विलुप्त हो गई।

इसीलिए बड़ी संख्या में किसान दूसरों और मशीनरी पर पूरी तरह से निर्भर हो गए। लेकिन आमिलपुर के किसानों नें बैलों और बैलगाडी का साथ कभी नहीं छोड़ा। किसानों ने इस बदलते परिवेश में भी नई इबारत लिखने का काम किया है। जिन बछड़ों को लोग बेकार समझकर छोड़ देते है जो अन्ना मवेशी कहलाते हैं किसानों ने उनको पकड़कर उनका सदउपयोग करने का काम किया है। किसान बताते हैं कि यूं तो उनके गांव में पहले से ही बैलों की कई जोड़ियां थी लेकिन जब से लोगों ने बछड़ों को छोड़ना चालू किया है तब से गांव में बैलों की जोड़ियां 50 गुना बढ़ गईं हैं। आज गांव में लोग इन्हीं बछड़ों को बैल बनाकर हल, बैलगाड़ी चलाकर अपनी खेती कर रहे हैं साथ ही अपनी आजीविका भी चला रहे हैं।