कोरोना वायरस से क्यों नहीं मरता चमगादड़, जानकर रह जाएंगे हैरान


गुवाहाटी:किसी वायरस को किसी जानवर से इंसान में जंप करने के लिए और खुद को अधिक से अधिक फैलाने के लिए एक खास होस्ट की जरूरत होती है। किसी वायरस को फलने-फूलने और फैलने के लिए जो खूबियां चाहिए होती हैं, उनमें से ज्यादातर चमगादड़ में पाई जाती हैं।

किसी भी जानवर में कुछ ऐसी खासियतें होती हैं, जो उसे किसी वायरस का एक इंटरमीडिएट होस्ट बनने के लिए जरूरी होती हैं। जैसे की चमगादड़। जिनमें कोरोना वायरस रहता है और लगातार अपने आपमें बदलाव करते हुए खुद को अधिक घातक बना सकता है।

-वायरस किसी जीव में जो खूबियां ढूंढ़ता है, उनमें ये चीजें शामिल हैं। सबसे पहले तो उस जीव की आयु लंबी होनी चाहिए। इस हिसाब से चमगादड़ अधिक से अधिक वायरसों के लिए एक अच्छा होस्ट बनता है। एक चमगादड़ की सामान्य उम्र 16 से 40 साल के बीच होती है।

-साथ ही वायरस ऐसे जानवर चाहता है जो बहुत बड़ी संख्या में एक साथ रहते हों। ताकि वायरस खुद को तेजी से अधिक से अधिक फैला सके। यह खूबी भी चमगादड़ में होती है।

-वायरस के लिए जरूरी है कि उसके होस्ट जीव का क्लोज सोशल इंटरेक्शन हो। क्लोज सोशल इंटरेक्शन को आप बहुत करीब रहने और झुंड में रहकर ही खाने से समझ सकते हैं।

– वायरस की ग्रोथ के लिए जरूरी है कि उस जीव में उड़ने की अच्छी क्षमता हो ताकि एक बार में लंबी दूरी तय कर पाएं और वायरस को दूर-दूर तक फैलने में सहायता मिल सके।

-मर्स के केस में वायरस चमगादड़ से अरेबियन ऊंट में आया और उसे अपना नैचरल रिजरवॉयर होस्ट बना लिया। ऊंट से यह वायरस दुर्घटनावश इंसानों में ट्रांसमिट हो गया।

-लेकिन क्योंकि मर्स का ह्यूमन टु ह्यूमन ट्रांसमिशन लंबे समय तक नहीं टिका। इसी कारण मर्स के मामले में ह्यूमन डेड एंड होस्ट कहलाते हैं। यानी ऐसे होस्ट जिनमें आकर वायरस खत्म हो गया।

-अगर तुलना करके देखें तो मर्स ऊंटों के लिए बहुत कम हानिकारक था। इसकी तुलना में सीवट्स (जंगली जीव) में सार्स कोरोना-1 और पैंगोलिन (जंगली जीव) में सार्स कोरोना-2 वायरस इनके लिए जानलेवा (पैथोजेनिक) हैं।

-म्यूटेशन:
क्योंकि कोरोना वायरस एक सिंगल स्ट्रैंडेड RNA वायरस है इसलिए इसमें म्यूटेशन (जिनोम में होनेवाले परिवर्तन) बहुत अधिक होता है। यही कारण है कि कोरोना वायरस नए-नए होस्ट में जल्दी अडप्ट हो जाता है।

-इसे ऐसे समझें कि मर्स वायरस ने जब ऊंट को अपना होस्ट बनाया तो उसे अडप्ट कर लिया और उसमें जीवित रह गया। लेकिन जब जंप करके वह इंसानों में आया तो उन्हें अपने होस्ट के रूप में अडप्ट नहीं कर पाया और खत्म हो गया।

– कोविड-19 के मामले में अब तक हुईं अलग-अलग रिसर्च के आधार पर यह सामने आ रहा है कि नॉर्मल कोरोना वायरस की तुलना में सार्स कोरोना-2 में म्यूटेशन कम पाया गया है।

-इससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि यह वायरस इंसानों में अडप्ट हो चुका है। यानी यह इंसान को अपने होस्ट के रूप में अपना चुका है।

-अगर ये रिसर्च सही साबित होती हैं तो यह हमारे वैज्ञानिकों के लिए एक अच्छी खबर हो सकती है। क्योंकि हमारे वैज्ञानिक इस वायरस के इलाज के लिए जो वैक्सीन और ऐंटिवायरल ड्रग डिवेलप कर रहे हैं, वे इस पर लंबे समय तक प्रभावी रहेगी।

-जिस वायरस का जिनोम बड़ा होता है, उसमें किसी दूसरे वायरस के साथ रीकॉम्बिनेशन बनाने और म्यूटेशन के बाद नया वायरस बनने की संभावना अधिक होती है। सार्स कोरोना वायरस-2 को उसका बड़ा जिनोम यह खूबी देता है।

-जब एक नया होस्ट तलाशने के लिए वायरस किसी व्यक्ति या जीव में जंप करता है तो यह बात विशेष महत्व रखती है कि उस होस्ट के बॉडी सेल के ऊपर बने रिसेप्टर्स के साथ इस वायरस की सतह पर लगे प्रोटीन कितनी अच्छी तरह बाइंड हो पाएंगे।

-अगर यहा बाइंडिंग अच्छी हो जाती है तो इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि वायरस इस जीव को अपना होस्ट बना लेगा।

-सार्स और सार्स कोरोना-2 की अगर तुलना करें तो रिसर्च में यह बात सामने आई है कि सार्स की तुलना में सार्स कोरोना-2 की बाइंडिंग कैपेसिटी ह्यूम्स के अंदर 10 से 20 गुना अधिक है।

– जब कोरोना वायरस किसी जीव में संक्रमण फैलाता है तो उसके अंदर तेजी से इंफ्लेमेशन (सूजन) होता है। लेकिन चमगादड़ में इंफ्लेमेशन कमजोर होता है। इसकी वजह यह है कि चमगादड़ के इंफ्लेमेट्री रिस्पॉन्स में डिफेक्ट होता है।

– चमगादड़ों में नैचरल किलर सेल्स की ऐक्टिविटी काफी कम होती है। इस कारण चमगादड़ के अंदर इस वायरस के इंफेक्शन को कैरी करनेवाली सेल्स मरती नहीं हैं।

-चमगादड़ का मेटाबॉलिक रेट बहुत हाई होता है, इस कारण उसमें अधिक मात्रा में रिऐक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज (ROS) बनती हैं, जो कोरोना वायरस को तेजी से रेप्लिकेट (प्रतिरूप) करने से रोकती हैं, साथ ही इसका म्यूटेशन रेट बढ़ा देती हैं।

-चमगादड़ में बढ़े हुए म्यूटेशन के कारण कोरोना को दूसरे होस्ट में जंप करने में आसानी होती है। इतना ही नहीं लगातार होनेवाला यह म्यूटेशन कोरोना को अधिक घातक भी बनाता है।

– क्योंकि चमगादड़ के अंदर स्ट्रॉन्ग इम्यून रिस्पॉन्स नहीं होता इस कारण चमगादड़ के अंदर सीवियर लंग डैमेज (फेफड़ों को जानलेवा नुकसान) के चांस कम हो जाते हैं। क्योंकि उसके फेफड़ों और शरीर में उतनी सूजन नहीं आती है कि उसे कोरोना के कारण सांस लेने में तकलीफ हो।

– चमगादड़ के अंदर इंटरफेरॉन रेस्पॉन्स बहुत मजबूत होता है। इस कारण कोरोना वायरस चमगादड़ के अंदर तेजी से अपने प्रतिरूप नहीं बना पाता। इंटरफेरॉन वे कैमिकल्स होते हैं, जो शरीर में किसी भी वायरस के रेप्लिकेशन को रोकते है।

-इसलिए इस बात पर हैरान होने की जरूरत नहीं है कि पिछले 20 साल में चमगादड़ से ही तीन तरह के कोरोना वायरस हमारी दुनिया में आए।

यह जानकारी इंटरनैशनल जर्नल ऑफ बायॉलजिकल साइंसेज में वर्ष 2020 में पब्लिश रिसर्च पेपर से ली गई है।