कुरआन इंसान की भलाई और हिदायत का रास्ता दिखाने वाली किताब है।

फर्रूखाबादः मोहम्मद आसिफ ने बताया कि रमजान के महीने में एक ऐसी रात है जो हजार महीनों से ज्यादा बेहतर है। इस रात से मुराद लैलतुल कद्र है। जैसे कि अल्लाह ने फरमाया कि हमने इस कुरआन को शब-ए कद्र में नाज़िल (अवतरित) किया है और तुम क्या जानो कि शब-ए कद्र क्या चीज है। शब-ए कद्र हजार महीनों से ज्यादा बेहतर है। उन्होने कहा कि कुरआन इंसान की भलाई और हिदायत का रास्ता दिखाने वाली किताब है। सच्ची बात तो यह है कि इंसान के लिये उससे बढ़कर कोई दूसरी नेयमत हो ही नहीं सकती। इस लिये कहा गया है कि इंसानी तारीख में कभी हजार महीनों में भी इंसानियत की भलाई के लिये वह काम नहीं हुआ जो एक रात में हुआ।

मोहम्मद शाहनवाज रज़ा ने बताया कि रोजो से दूसरों की भूख और प्यास का एहसास होता है। उन्होने कहा कि रमजान ए पाक का महीना न सिर्फ रहमतों और बरकातों का महीना है। बल्कि सारी कायनात को मोहब्बत और इंसानियत का संदेश भी देता है। इस माह में ज़कात व सदक़ा खैरात व अतियात देने व अल्लाह की राह में खर्च करने का सवाब सात गुना से लेकर 70 गुना से ज्यादा होता है। रमजान में असल अहमियत अमल की है।

मोहम्मद सादाद ने बताया कि ज़कात देना फर्ज है। कुरआन मजीद की आयतों और हुजूर सल्लाहो अलैहे वसल्लम की हदीसों से इसकी फर्जिलत साबित होती है। जो शख्स ज़कात फर्ज होने का इनकार करें। वह काफिर है।

सैय्यद तारिक मियाँ ने बताया कि ज़कात का लफ्ज तज्क़िये (पाक करना) से बना है, ज़कात इंसान के माल को पाक करती है और बढ़ाती है। इंसान के नफ्स को हिर्स (लालच) से पाक करती है। जो शख्स अपने माल से ज़कात निकालता है। गोया वह यक़ीन करता है कि मेरा भरोसा माल पर नहीं बल्कि अल्लाह की ज़ात पर है। जो अपनी राह में खर्च करने वालों को बेहिसाब देता है।

जॉन मोहम्मद अंसारी ने बताया कि अल्लाह के रसूल ने फरमाया कि रोजा और कुरआन बंदे की शफाअत करेंगे। जब रमजान शरीफ तशरीफ लाता है। तो आसमान के दरवाजे खोल दिये जाते है और शैतान को जंजीरों में जकड़ लिया जाता है।

डॉ0 मोहम्मद इकबाल अहमद ने कहा कि रोजा रखना हर इंसान को हर चीज का पाबंद बनाता है। आंख का रोजा यह है कि जिस चीज को देखने से अलह ने मना किया है। उसे न देखे कान का रोजा यह है कि जिस बात को सुनने से अल्लाह ने मना किया है। उसे न सुने जुबान का रोजा यह कि जिस बात को बोलने से अल्लाह ने मना किया उसे न बोले, हाथ को रोजा यह है कि जिस काम को करने से अल्लाह ने मना किया है उसे न करें। पैर का रोजा यह है कि जिस तरफ जाने से मना किया उधर न जाए।

मज़हर मोहम्मद खां ने कहा कि रमजान में विशेष रूप से इंसान को गुनाहों से डर लगता है। यही खुदा का डर और आखिरत का यकीन ही इंसान को गुनाहों से बचाता है। रोजा बुरे-बुरे कामों से भी रोकता है। रोजे के दौरान पाक साफ जिन्दगी गुजारता है। रोजेदार इस दौरान यदि कोई गलत काम होने की संभावना हो भी जाए तो रोजा तुरन्त रोकता है।

मोहम्मद हफीज खां ने बताया कि इंसान का जिस्म और रूह भी अल्लाह की अमानत है। उन्होने लोगों से अपील की कि केवल एक माह के लिये नहीं ताउम्र के लिये नेक बनों इस्लाम शांति का पैगाम देता है।