आत्मा को पाकीजगी का मौका देता है रमज़ान

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फर्रूखाबाद। बंदे को हर बुराई से दूर रखकर अल्लाह के नजदीक लाने का मौका देने वाले वाले पाक महीने रमज़ान की रूहानी चमक से दुनिया एक बार फिर रोशन हो चुकी है और फिजा में घुलती अजान और दुआओं में उठते लाखों हाथ खुदा से मुहब्बत के जज्बे को शिद्दत दे रहे हैं।
दौड़-भाग और खुदगर्जी भरी जिन्दगी के बीच इंसान को अपने अन्दर झांकने और खुद को अल्लाह की राह पर ले जाने की प्रेरणा देने वाले रमज़ान महीने में भूख-प्यास के साथ तमाम शारीरिक इच्छाओं तथा झूठ बोलने, चुगली करने, खुदगर्जी, बुरी नजर डालने जैसी सभी बुराईयों पर लगाम लगाने की मुश्किल कवायद रोजेदार को अल्लाह के करीब पहुॅच देती है।

रमज़ान की फजीलत
इस महीने में रोजेदार अल्लाह के नजदीक आने की कोशिश के लिये भूख-प्यास के साथ इच्छाओं को रोकता है। बदले में अल्लाह अपने उस इबादत गुजार रोजेदार बंदे के बेहद करीब आकर उसे अपनी रहमतों और बरकतों से नवाजता है। इस्लाम की पांच बुनियादों में रोजा भी शामिल है और इस पर अमल के लिये ही अल्लाह ने रमज़ान का महीना मुकर्रर किया है। खुद अल्लाह ने कुरआन शरीफ में इस महीने का जिक्र किया है। रमजान की फजीलतेंः- इंसान के अन्दर जिस्म और रूह है। आम दिनों में उसका पूरा ध्यान खाना-पानी अैर दीगर जिस्मानी जरूरतों पर रहता है। लेकिन असल चीज उसकी रूह है। इसी की तरबीयत पाकीजगी के लिये अल्लाह ने रमज़ान बनाया है। रमज़ान में की गई हर नेकी का सवाब कई गुना बढ़ जाता है। इस महीने में एक रकात नमाज अदा करने का सवाब 70 गुना हो जाता है। साथ ही इस महीने में दोजख के दरवाजे बन्द कर दिये जाते हैं।
रमज़ान के तीन अशरे-
अमूमन 30 दिनों के रमज़ान महीने को तीन अशरों खंडों में बांटा गया है। पहला अशरा ‘‘रहमत का’’ है इसमें अल्लाह अपने बंदों पर रहमत की बारिश करता है। दूसरा अशरा ‘‘बरकत’’ का है जिसमें अल्लाह बरकत नाजिल करता है। तीसरा अशरा ‘‘मगफिरत’’ का है। इस अशरे में अल्लाह अपने बंदों के गुनाहों बख्श देता है।